ये बारिशें जब भी गिरती हैं काँच की दीवारों पे ,
हज़ारों ख़्वाब लिख जातीं हैं आडी तिरछी लकीरों में...
और फिर काँच के इस पार सब धुँधला सा होने लगता है,
ना जाने क्यों उसे मिटाने को जी नहीं करता,
मानो कई जज़्बातों का एक गुच्छा सा ठहर गया हो...
अक्सर सोचता हूँ, क्या ये अल्प-पारदर्शिता सच में इतनी खूबसूरत है ?
शायद हाँ या शायद हाँ !!!
Beautiful
ReplyDeleteThank you Manjari :)
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