और मैं भटकते भटकते यहाँ आ पहुँचा,
जैसे हम सब भटकते हैं बेहतर ज़िन्दगी की तलाश में...
गुलज़ार जी कहते हैं "हाँ तलाश ही तो ज़िन्दगी है"
पर खुद की खोज अब भी ज़ारी है,
अक्सर सारी उमर निकलते देखी है मैंने और पता भी नहीं होता कि हम क्या तलाश रहें हैं
रुह में लिपटी मिटटी, हर दिन झाड़ते थोड़ा थोड़ा है,
अक्सर सोचता हूँ की एक अरसे के बाद जब रुह नंगी होने वाली होगी,
तो क्या ऐसा बात होगी जिसपे मैं पछतावा करूँगा या क्या ऐसी बात होगी जिस पर मैं अभिमान करूँगा।
दादा जी के आख़िरी दिनों में मुझे इस बात का अनुभव हुआ था।
सोचता हूँ अक्सर ये भी कि इन सब पचड़े में ना पड़ते हुए,बहने देता हु खुद को जीवन धारा के साथ
अगले हि पल यूँ हि फिर अचानक से मचल जाता हूँ और खुद से झगड़ा करने लगता हूँ....
झगड़ा क्या ही कहें इसे, ये तो द्वन्द है द्वन्द...
मैं कहता हूँ आ गयी मंजिल ठहर जा
वो कहता है, नहीं थोड़ा और चलते हैं , अगली मंजिल बेहतर होगी।
मैं कहता हूँ थक गया हू, अब जीने दो मुझे
तो क्या ऐसा बात होगी जिसपे मैं पछतावा करूँगा या क्या ऐसी बात होगी जिस पर मैं अभिमान करूँगा।
दादा जी के आख़िरी दिनों में मुझे इस बात का अनुभव हुआ था।
सोचता हूँ अक्सर ये भी कि इन सब पचड़े में ना पड़ते हुए,बहने देता हु खुद को जीवन धारा के साथ
अगले हि पल यूँ हि फिर अचानक से मचल जाता हूँ और खुद से झगड़ा करने लगता हूँ....
झगड़ा क्या ही कहें इसे, ये तो द्वन्द है द्वन्द...
मैं कहता हूँ आ गयी मंजिल ठहर जा
वो कहता है, नहीं थोड़ा और चलते हैं , अगली मंजिल बेहतर होगी।
मैं कहता हूँ थक गया हू, अब जीने दो मुझे
फिर वो कहता है, सफर ही तो ज़िन्दगी है , ठहर गया तो थक जायेगा
फिर मेरे मन में एक अजीब सा डर पनपता है
और मैं कहता हूँ,
लेक़िन मैं तो हमेशा से ठहराव चाहता था, क्या ठहराव मिथ्या है ???
सफर में रहा तो सब अपने छूटते रहेगे, नए अपने, अपने जैसे कहाँ होते हैं, अगर हुए भी तो....
वो कहता है ये सब सोचना ओवेरथीनकिंग हैं,
फिर मैं कहता हूँ इग्नोरैंट होना क्या बहुत अच्छी बात है !
वो फिर जवाब देता है, "ignorance is a bliss "
फिर मैं पूँछता हूँ क्यों बुद्धा को पूजते हो फिर ?
लंबी ख़ामोशी के बाद....
वो कहता है खुद से शास्त्राथ करना बेवकूफी है
मैं कहता हूं मैं आज भी शांति का मोहताज़ हूँ, मुझे लड़ना होगा।
वो कहता है जीत भी गए तो तुम ही हारोगे
मैं कहता हूँ हारा भी तो क्या, मैं हि जीतूंगा
फिर वो कहता हैं परिवर्तन संसार का नियम है, तुम्हे इसे अपनाना होगा
मैं कहता हूं फिर मुझे संसार के और भी नियम जानने हैं...
बहुत वक़्त से अब दूसरी तरफ से जवाब नहीं आया....
और मैं ........
उम्मीद-ए-ठहराव लिए अक्सर सफर में रहता हूँ
अब न सफर ख़तम होता है और ना उम्मीद।।।
विवेक,
पेनांग, मलेशिया
९ जनवरी, २०१७
फिर मेरे मन में एक अजीब सा डर पनपता है
और मैं कहता हूँ,
लेक़िन मैं तो हमेशा से ठहराव चाहता था, क्या ठहराव मिथ्या है ???
सफर में रहा तो सब अपने छूटते रहेगे, नए अपने, अपने जैसे कहाँ होते हैं, अगर हुए भी तो....
वो कहता है ये सब सोचना ओवेरथीनकिंग हैं,
फिर मैं कहता हूँ इग्नोरैंट होना क्या बहुत अच्छी बात है !
वो फिर जवाब देता है, "ignorance is a bliss "
फिर मैं पूँछता हूँ क्यों बुद्धा को पूजते हो फिर ?
लंबी ख़ामोशी के बाद....
वो कहता है खुद से शास्त्राथ करना बेवकूफी है
मैं कहता हूं मैं आज भी शांति का मोहताज़ हूँ, मुझे लड़ना होगा।
वो कहता है जीत भी गए तो तुम ही हारोगे
मैं कहता हूँ हारा भी तो क्या, मैं हि जीतूंगा
फिर वो कहता हैं परिवर्तन संसार का नियम है, तुम्हे इसे अपनाना होगा
मैं कहता हूं फिर मुझे संसार के और भी नियम जानने हैं...
बहुत वक़्त से अब दूसरी तरफ से जवाब नहीं आया....
और मैं ........
उम्मीद-ए-ठहराव लिए अक्सर सफर में रहता हूँ
अब न सफर ख़तम होता है और ना उम्मीद।।।
विवेक,
पेनांग, मलेशिया
९ जनवरी, २०१७

Good yaar. Some lines are really thought provoking like:
ReplyDeleteमैं कहता हूँ थक गया हू, अब जीने दो मुझे
फिर वो कहता है, सफर ही तो ज़िन्दगी है , ठहर गया तो थक जायेगा
सफर में रहा तो सब अपने छूटते रहेगे, नए अपने, अपने जैसे कहाँ होते हैं, अगर हुए भी तो.
Thank you Aamir :)
DeleteNice composition
ReplyDeleteThanks a lot Manjari :)
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