अक्सर मैं समय के परे जाकर, सच कर लेना चाहता हूँ अपने उन दिवास्वप्नो को,
परन्तु इस भ्रान्तिमय संसार में, क्यों सिमट कर रह जाता हूँ और फिर से चलने लगता हूँ भेड़चाल में...
प्रायः ये ख्याल मुझे अवसाद की तरफ ले जाता है, फिर से सही और गलत का संघर्ष होता है, फिर से मस्तिस्क में हज़ारों ताने बाने चलते हैं और मांगता हूँ जवाब...
मैं चाहता हूँ सलिल सा सरल और निर्मल, पर हमेशा पाता हूँ जटिल और भ्रान्तिमय !
फिर सोचता हूँ ये अगर सरल होता तो सबको पता होता, जटिल है तभी तो हम सब भटकते हैं !
फिर सोचता हूँ ये अगर सरल होता तो सबको पता होता, जटिल है तभी तो हम सब भटकते हैं !
क्या मेरी नियति में भी उन असंख्य प्राणियों की तरह भटकना लिखा है, अगर ऐसा है भी तो क्या मैं अपनी नियति को बदल नहीं सकता ?
ये उधेड़बुन आज यकायक उत्पन्न नहीं हुई है, अगर हुई होती तो कब की विलुप्त हो गयी होती! यूँ कलम का सहारा ना ले रहा होता इसे उगलने को, ये तो शायद तब से है जबसे मैं इस नश्वर संसार से वाकिफ हुआ हूँ।
देखता हूँ हमेशा एक झीनी सी श्वेत चादर, और लगता है चादर के उस पार सब शांत और सरल है,
फिर अनायास ही हटाना शुरू कर देता हूँ, उन चादरों को....
एक के बाद एक , एक के बाद एक.... अनन्त, अब तक मैं उस पार पहुंच नहीं पाया।
सोचता हूँ क्या इस अल्पपरदर्शिता ने ही मुझे ज़िंदा रखा हुआ है?
क्या उस पार कुछ भी नहीं है?
क्या ये सब मेरे मन का वहम है?
प्रायः प्रातःकाल के सपनो की भांति , कुछ स्पष्ट नहीं होता और फिर जीवनसरिता के साथ बहने लगता हूँ। ...
विवेक गुप्ता
प्रातःकाल, १० जुलाई , २०१६
फिर अनायास ही हटाना शुरू कर देता हूँ, उन चादरों को....
एक के बाद एक , एक के बाद एक.... अनन्त, अब तक मैं उस पार पहुंच नहीं पाया।
सोचता हूँ क्या इस अल्पपरदर्शिता ने ही मुझे ज़िंदा रखा हुआ है?
क्या उस पार कुछ भी नहीं है?
क्या ये सब मेरे मन का वहम है?
प्रायः प्रातःकाल के सपनो की भांति , कुछ स्पष्ट नहीं होता और फिर जीवनसरिता के साथ बहने लगता हूँ। ...
विवेक गुप्ता
प्रातःकाल, १० जुलाई , २०१६
